जीण माता धाम

जीणमाता मंदिर एक प्राचीन जीणमाता शक्ति की देवी को समर्पित मंदिर है। जीणमाता का पूर्ण और वास्तविक नाम जयन्तीमाता है। माता दुर्गा की अवतार है। जीण माता धाम जीण माता का निवास है। यह चौहानों की कुल देवी है। ये भव्य धाम चरों तरफ़ से ऊँची ऊँची पहाडियों से घिरा हुआ है। बरसात या सावन के महीने में इन पहाडो की छटा देखाने लायक़ होती है।

कलयुग में शक्ति का अवतार माता जीण भवानी का भव्य धाम जयपुर से से लगभग 115 किलोमीटर दूर सीकर ज़िले (Sikar District) के सुरम्य अरावली पहाड़ियों (रेवासा पहाडियों) में स्थित है। जीण माता मंदिर सीकर से लगभग 15 कि.मी. दूर दक्षिण में जयपुर बीकानेर राजमार्ग पर गोरियां रेलवे स्टेशन से 15 कि.मी. पश्चिम व दक्षिण के मध्य खोस नामक गाँव के पास स्थित है। (राष्ट्रिये राजमार्ग 11 से ये लगभग 10 किलोमीटर की दुरी पर) 17 कि.मी. लम्बा यह मार्ग पहले अत्यंत दुर्गम व रेतीला था किन्तु विकास के दौर में आज यह काफ़ी सुगम हो गया है। सकरा व जीर्ण शीर्ण मार्ग चोडा व काफ़ी हद चिकना हो चुका है। रानोली से माता के दर्शन के लिए अच्छी सड़क बनाई गयी है। यानी की गौरियाँ (यहाँ से सीधी रोड आती है) या रानोली (यहाँ से कोछौर देकर आना पड़ता है) स्टैंड द्वारा यहाँ पहुंचा जा सकता है।

जीण माता मन्दिर

जीण माता (Jeen Mata) के बारे में अभी तक कोई पुख्ता जानकारी मौजूद नहीं है फ़िर भी कहते है की माता का मन्दिर कम से कम 1000 साल पुराना है। जीणमाता मंदिर घने जंगल से घिरा हुआ है। यह मंदिर तीन छोटी पहाडों के संगम में 20 – 25 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। जीण माता मंदिर के ऊपर 17 कि.मी. सीधी चढ़ाई बाले हर्ष पर्वत पर स्थित 10वी शताब्दी का यह मंदिर, अनेक लोक श्रुतियों का जन्म दाता है। ओरंगजेब द्वारा किये गए विध्वंस के चिन्ह आज भी दूर दूर तक बिखरे हुए हैं। प्रस्तर पर उकेरे अनुपम पौराणिक आख्यान, अदभुत पुरातात्विक कलाकृतियाँ – जिसमें ना जाने कितने कलाकारों का अमूल्य परिश्रम लगा होगा – आज धूल धूसरित खंडित जहां तहां बिखरे पड़े हैं। पुराने शिव मंदिर के स्थान पर नवीन मंदिर निर्माण हो चुका है, किन्तु खंडित ध्वंसावशेष बता रहे हैं कि पुराने मंदिर से उसकी कोई तुलना नहीं हो सकती। संगमरमर का विशाल शिव लिंग तथा नंदी प्रतिमा आकर्षक है। पराशर ब्राह्मण वंश परंपरा से उनकी सेवा पूजा में नियुक्त हैं। पास ही हर्षनाथ का मंदिर है जहां चामुंडा देवी तथा भैरव नाथ के साथ उनकी दिव्य प्रतिमाये स्थित हैं। सेकड़ों के तादाद में काले मुंह के लंगूर मंदिर पर चढ़ाए जाने वाले प्रसाद के पहले अधिकारी हैं।

माता का निज मंदिर दक्षिण मुखी है परन्तु मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व में है। मंदिर से एक फर्लांग दूर ही सड़क के एक छोर पर जीणमाता बस स्टैंड है। सड़क के दोनों और मंदिर से लेकर बस स्टैंड तक श्रद्धालुओं के रुकने व आराम करने के लिए भारी तादात में तिबारे (बरामदे) व बिना दरवाजों की अनेकों धर्मशालाएं बनी हुई है, जिनमे ठहरने का कोई शुल्क नहीं लिया जाता। मंदिर प्रवंध समिति की आधुनिक सुख सुविधायुक्त धर्मशालाएं भी यात्रियों के लिए हैं – जो नाम मात्र के शुल्क पर उपलव्ध हैं। कुछ और भी पूर्ण सुविधाओं युक्त धर्मशालाएं है जिनमे उचित शुल्क देकर ठहरा जा सकता है। बस स्टैंड के आगे ओरण (अरण्य) शुरू हो जाता है इसी अरण्य के मध्य से ही आवागमन होता है।

जीण माँ भगवती की यह बहुत प्राचीन शक्ति पीठ है, जिसका निर्माणकार्य बड़ा सुंदर और सुद्रढ़ है। मंदिर की दीवारों पर तांत्रिको व वाममार्गियों की मूर्तियाँ लगी है जिससे यह भी सिद्ध होता है कि उक्त सिद्धांत के मतावलंबियों का इस मंदिर पर कभी अधिकार रहा है या उनकी यह साधना स्थली रही है। मंदिर के देवायतन का द्वार सभा मंडप में पश्चिम की और है और यहाँ जीण माँ भगवती की अष्टभुजी आदमकद मूर्ति प्रतिष्ठापित है। सभा मंडप पहाड़ के नीचे मंदिर में ही एक और मंदिर है जिसे गुफा कहा जाता है जहाँ जगदेव पंवार का पीतल का सिर और कंकाली माता की मूर्ति है। मंदिर के पश्चिम में महात्मा का तप स्थान है जो धुणा के नाम से प्रसिद्ध है। जीण माता मंदिर के पहाड़ की श्रंखला में ही रेवासा व प्रसिद्ध हर्षनाथ पर्वत है। हर्षनाथ पर्वत पर आजकल हवा से बिजली उत्पन्न करने वाले बड़े-बड़े पंखे लगे है।

मंदिर की प्राचीनता का इतिहास

जीण माता मंदिर का निर्माण काल कई इतिहासकार आठवीं सदी में मानते है। मंदिर में अलग-अलग आठ शिलालेख लगे है जो मंदिर की प्राचीनता के सबल प्रमाण है।

संवत 1029 यह महाराजा खेमराज की मृत्यु का सूचक है।
संवत 1132 जिसमे मोहिल के पुत्र हन्ड द्वारा मंदिर निर्माण का उल्लेख है।
संवत् 1162 विक्रम वर्ष 1162 का एक शिलालेख (1105 ई.), शेखावाटी में जीणमाता मंदिर सभामंदप की एक स्तंभ पर उत्कीर्ण है, कॉल मैं प्रिथ्विराजा परमभात्तारका महाराजधिराजा – परमेश्वर, जिससे उसकी महान शक्ति का एक शासक के रूप में स्वतंत्र स्थिति दिखा।
संवत 1196 महाराजा आर्णोराज के समय के दो शिलालेख।
संवत 1230 इसमें उदयराज के पुत्र अल्हण द्वारा सभा मंडप बनाने का उल्लेख है।
संवत 1382 जिसमे ठाकुर देयती के पुत्र श्री विच्छा द्वारा मंदिर के जीर्णोद्दार का उल्लेख है।
संवत 1520 में ठाकुर ईसरदास का उल्लेख है।
संवत 1535 को मंदिर के जीर्णोद्दार का उल्लेख है।

उपरोक्त शिलालेखों में सबसे पुराना शिलालेख संवत 1029 (972 AD) का है पर उसमे मंदिर के निर्माण का समय नहीं लिखा गया अतः यह मंदिर उससे भी अधिक प्राचीन है। चौहान चन्द्रिका नामक पुस्तक में इस मंदिर का 9 वीं शताब्दी से पूर्व के आधार मिलते है।

बुरडक गोत्र के अभिलेखों में जीण माता

चौहान वंश से निकले बुरडक गोत्र के बडवा श्री भवानीसिंह राव के अभिलेखों में जीण माता के सम्बन्ध में कुछ ऐतिहासिक तथ्य मिलते हैं जो निम्नानुसार हैं :-

चौहान राजा रतनसेण के बिरमराव पुत्र हुए। बिरमराव ने अजमेर से ददरेवा आकर राज किया। संवत 1078 (1021 AD) में किला बनाया। इनके अधीन 384 गाँव थे। बिरमराव की शादी वीरभाण की बेटी जसमादेवी गढ़वाल के साथ हुई। इनसे तीन पुत्र उत्पन्न हुए :-

1. सांवत सिंह – सांवत सिंह के पुत्र मेल सिंह, उनके पुत्र राजा धंध, उनके पुत्र इंदरचंद तथा उनके पुत्र हरकरण हुए। इनके पुत्र हर्ष तथा पुत्री जीण उत्पन्न हुयी। जीणमाता कुल देवी संवत 990 (933 AD) में प्रकट हुयी।

2. सबल सिंह – सबलसिंह के बेटे आलणसिंह और बालणसिंह हुए। सबलसिंह ने जैतारण का किला संवत 938 (881 AD) में आसोज बदी 10 को फ़तेह किया। इनके अधीन 240 गाँव थे।

3. अचल सिंह –

सबलसिंह के बेटे आलणसिंह के पुत्र राव बुरडकदेव, बाग़देव, तथा बिरमदेव पैदा हुए। आलणसिंह ने संवत 979 (922 AD) में मथुरा में मंदिर बनाया तथा सोने का छत्र चढ़ाया।

ददरेवा के राव बुरडकदेव के तीन बेटे समुद्रपाल, दरपाल तथा विजयपाल हुए।

राव बुरडकदेव (b. – d.1000 AD) महमूद ग़ज़नवी के आक्रमणों के विरुद्ध राजा जयपाल की मदद के लिए लाहोर गए। वहां लड़ाई में संवत 1057 (1000 AD) को वे जुझार हुए। इनकी पत्नी तेजल शेकवाल ददरेवा में तालाब के पाल पर संवत 1058 (1001 AD) में सती हुई। राव बुरडकदेव से बुरडक गोत्र निकला।

राव बुरडकदेव के बड़े पुत्र समुद्रपाल के 2 पुत्र नरपाल एवं कुसुमपाल हुए। समुद्रपाल राजा जयपाल के पुत्र आनंदपाल की मदद के लिए ‘वैहिंद’ (पेशावर के निकट) गए और वहां पर जुझार हुए। संवत 1067 (1010 AD) में इनकी पत्नी पुन्यानी साम्भर में सती हुई।

बुरडक गोत्र के बडवा श्री भवानीसिंह राव के उपरोक्त अभिलेखों की पुष्टि ऐतिहासिक तथ्यों से होती है।

मंदिर के पश्चिम में जीण वास नामक गांव है जहाँ इस मंदिर के पुजारी व बुनकर रहते है। यह गाँव बुरड़कों द्वारा बसाया गया था।

जीण माता मंदिर से कुछ ही दूर रलावता ग्राम के नजदीक खूड के गांव मोहनपुरा की सीमा में शेखावत वंश प्रवर्तक रावशेखा का स्मारक स्वरुप छतरी बनी हुई है। राव शेखा ने गौड़ क्षत्रियों के साथ युद्ध करते हुए यहीं शरीर त्याग कर वीरगति प्राप्त की थी।

॥ जय जीण भवानी की जय॥

श्री जीण धाम की मर्यादा व पूजा विधि

जीण माता मन्दिर स्थित पुरी सम्प्रदाय की गद्‌दी (धुणा) की पूजा पाठ केवल पुरी सम्प्रदाय के साधुओं द्वारा ही किया जाता है।
जो पुजारी जीण माता की पूजा करते हैं, वो पाराशर ब्राह्मण हैं।
जीण माता मन्दिर पुजारियों के लगभग 100 परिवार हैं जिनका बारी-बारी से पूजा का नम्बर आता है।
पुजारियों का उपन्यन संस्कार होने के बाद विधि विधान से ही पूजा के लिये तैयार किया जाता है।
पूजा समय के दौरान पुजारी को पूर्ण ब्रह्मचार्य का पालन करना होता है व उसका घर जाना पूर्णतया निषेध होता है।
जीण माता मन्दिर में चढ़ी हुई वस्तु (कपड़ो, जेवर) का प्रयोग पुजारियों की बहन-बेटियां ही कर सकती हैं। उनकी पत्नियों के लिए निषेध होता है।
जीण भवानी की सुबह 4 बजे मंगला आरती होती है। आठ बजे शृंगार के बाद आरती होती है व सायं सात बजे आरती होती है। दोनों आरतियों के बाद भोग (चावल) का वितरण होता है।
माता के मन्दिर में प्रत्येक दिन आरती समयानुसार होती है। चन्द्रग्रहण और सूर्य ग्रहण के समय भी आरती अपने समय पर होती है।
हर महीने शुक्ल पक्ष की अष्टमी को विशेष आरती व प्रसाद का वितरण होता है।
माता के मन्दिर के गर्भ गृह के द्वार (दरवाज़े) 24 घंटे खुले रहते हैं। केवल शृंगार के समय पर्दा लगाया जाता है।
हर वर्ष शरद पूर्णिमा को मन्दिर में विशेष उत्सव मनाया जाता है, जिसमें पुजारियों की बारी बदल जाती है।
हर वर्ष भाद्रपक्ष महीने में शुक्ल पक्ष में श्री मद्‌देवी भागवत का पाठ व महायज्ञ होता है।
जीण धाम स्थित पहाड़ो व नदी की बजरी आदि का व्यावसायिक प्रयोग होता है।